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International Journal of
Humanities and Social Science Research
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VOL. 6, ISSUE 6 (2020)
समकालीन भारतीय दर्शन में गाँधीवाद और अहिंसा का संगठन
Authors
डाॅ. बिपिन बिहारी मधुकर
Abstract
प्रस्तुत शोध-पत्र ‘समकालीन भारतीय दर्शन में गाँधीवाद और अहिंसा का संगठन’ पर आधारित है। गाँधी जी का ‘वाद’ वस्तुतः वाणी का व्यवहार है। यह संस्कृत के ‘वद्’ धातु से बनता है।1 ‘वाद’ से हम किसी सामान्य क्रिया, विशेष-व्यवहार व सिद्धांत को समझते हैं।2 विचार जब किसी व्यक्ति की मर्यादा में कैद हो जाता है, तो वह ‘वाद’ बन जाता है और विचार जब धार्मिक आग्रह या मतविशेष पर आरूढ़ हो जाता है, तो वह ‘सम्प्रदाय’ बन जाता है। अंध आग्रह वाद का मूल है एवं हठ मानो इनका प्राण। वादों का जन्म अक्सर उन लोगों की प्रेरणा से नहीं होता, जिनके नाम पर वे स्थापित होते हैं, बल्कि मूल विचारों पर अनुयायियों द्वारा लादी जानेवाली मर्यादाओं के फलस्वरूप वे अस्तित्व में आते हैं। रचनात्मक प्रतिमा के अभाव में अनुयायी प्रणालियाँ व संगठन बनाते हैं और ऐसा करने के समय वे मूल सिद्धान्तों को कठोर, स्थिर, एक पक्षीय और कट्टर बना देते हैं जिससे उनकी मौलिक ताजगी और धारावाहिकता नष्ट हो जाती है, जो कि जीवन की निशानी है।3
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Pages:54-55
How to cite this article:
डाॅ. बिपिन बिहारी मधुकर "समकालीन भारतीय दर्शन में गाँधीवाद और अहिंसा का संगठन". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 6, Issue 6, 2020, Pages 54-55
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