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International Journal of
Humanities and Social Science Research
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VOL. 2, ISSUE 8 (2016)
आदर्श समाज निर्माण के लिए पंचशिल का महत्त्व
Authors
डाॅ0 रविन्द्र नारायणराव मुन्द्रे
Abstract
आम उपासक से लेकर भिक्खू या अर्हत बनने तक का सफर यदी हमे करना है, तो पंचशिल का आचरण जरूरी है। तथागत बुध्द ने अपने पंचवर्गीय भिक्खू को उपदेश करते हुये पंचशिल तत्व बतलाए। किसी को हताहत न करना, चोरी न करना, व्यभिचार न करना, झुठ न बोलना, नशीली वस्तूओं का सेवन न करना यह वह पांच तत्व है।
तथागत बुध्द को अहिंसा तत्व Need to kill, Will to kill न इस सिध्दांत पर निर्भर था। मानसिक और नैतिक हिम्मत बढाने की शक्ती अहिंसा मे होने के कारण मानव समाज का आत्मविश्वास बढकर वह समाज मानव संस्कृती के रक्षण के लिए तत्पर होता है। इसलिए अहिंसा का तत्व पंचशिल में सर्वश्रेष्ठ है। जब आपको कोई भी अन्य उपाय दृष्टीगोचर न हो और आदमी बहुत ही मजबूर हो तव भी किसी अन्य व्यक्ति की वस्तू लेना उचित नही ठहराया जा सकता । सामाजिक स्वाथ्य के लिए यह वर्तन अनिवार्य हो जाता हैं। वासनाधंता के समान कुछ नही है, वासना सबसे उग्र उत्तेजना कही जा सकती है यदी सत्य की लालच वासना की उग्रता से बढकर न होती तो हम में से कितने लोग धार्मिक जीवन बिता सकते थे। विवेक जागृत रखकर सत्य बोलना अनिवार्य है। यदी झुठ बोलने से किसी की जान बचती है तो वह झुठ सर्वश्रेष्ठ सत्य है। नशीली वस्तू इन्सान से मुर्खतापूर्ण व्यवहार करवाते है। इतना ही नही उसे पाप का भागीदार भी बनाते है। जो सद्गृहस्थ धम्माचरण मे रस लेता है उसने किसी भी नशीले पदार्थ का सेवन नही करना चाहिये। जो पीने वाले है उनका समर्थन भी नही होना चाहिये।
समाज मे आचरण करते समय फिर वह सही है या गलत इसके लिए नियमों का होना आवश्यक हैं। अच्छा आचरण केवल और केवल पंचशिल से ही हो सकता है और आदर्श समाज का मापदंड पंचशिल ही होना चाहिए।

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Pages:101-104
How to cite this article:
डाॅ0 रविन्द्र नारायणराव मुन्द्रे "आदर्श समाज निर्माण के लिए पंचशिल का महत्त्व". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 2, Issue 8, 2016, Pages 101-104
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