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International Journal of
Humanities and Social Science Research
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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
वंदे मातरम्: राष्ट्रीय एकता और वैचारिक विरोधाभास के बीच ऐतिहासिक विमर्श
Authors
किशोर कुमार, मिथिलेश पंडित
Abstract
यह शोध पत्र वन्दे मातरम् की ऐतिहासिक यात्रा और उससे जुड़े वैचारिक अर्थों का संक्षिप्त विश्लेषण प्रस्तुत करता है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की यह रचना आरंभ में साहित्यिक अभिव्यक्ति मात्र थी, किंतु 1905 के बंगाल विभाजन के बाद यह औपनिवेशिक सत्ता के विरोध में उभरती राष्ट्रवादी चेतना की सशक्त आवाज़ बन गई। सभाओं, जुलूसों और विद्यार्थियों के आंदोलनों में इसके प्रयोग ने इसे आम जनता की भावनाओं से जोड़ दिया। इसके साथ ही शोधपत्र यह भी स्पष्ट करता है कि गीत में निहित सांस्कृतिक रूपक और मातृभूमि के देवीस्वरूप चित्रण के कारण समाज के एक वर्ग के एक हिस्से में असहजता उत्पन्न हुई, जो आगे चलकर 1920 और 1930 के दशकों में राजनीतिक विमर्श का विषय बनी। शोध का केंद्रीय तर्क यह है कि वन्दे मातरम् को किसी एक निश्चित श्रेणी में सीमित नहीं किया जा सकता। यह न तो मात्र एक सांस्कृतिक रचना है और न ही मात्र राष्ट्रवादी प्रतीक। इसमें समय और परिस्थितियों के साथ इसके अर्थों में आए बदलाव इसे औपनिवेशिक भारत में राष्ट्र-निर्माण, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक संबंधों को समझने का एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत बनाते हैं।
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Pages:381-385
How to cite this article:
किशोर कुमार, मिथिलेश पंडित "वंदे मातरम्: राष्ट्रीय एकता और वैचारिक विरोधाभास के बीच ऐतिहासिक विमर्श ". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 381-385

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