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VOL. 11, ISSUE 3 (2025)
लोकतंत्र में न्यायाधीशों की जिम्मेदारी
Authors
अमित वर्मा
Abstract
लोकतांत्रिक शासन प्रणाली
में जनता को सर्वोच्च स्थान प्राप्त होता है तथा राज्य की शक्तियाँ विधायिका, कार्यपालिका
एवं न्यायपालिका के मध्य संतुलित रूप से विभाजित रहती हैं। भारतीय संविधान में
शासन के तीनों अंगों के मध्य नियंत्रण एवं संतुलन की व्यवस्था स्थापित की गई है, ताकि
सभी संस्थाएँ संविधान के दायरे में रहकर स्वतंत्र एवं प्रभावी रूप से कार्य कर
सकें। न्यायपालिका को स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं विवेकशील संस्था के रूप में मान्यता प्राप्त
है, जो न
केवल संविधान एवं नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करती है, बल्कि
विधि के शासन की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । न्यायाधीश न केवल
विधि की व्याख्या करते हैं, बल्कि अपने निर्णयों के माध्यम से समाज में समानता, स्वतंत्रता
एवं न्याय सुनिश्चित करते हैं। यह शोध प्रपत्र लोकतांत्रिक भारत में न्यायपालिका
की भूमिका, विशेषकर
समय, परिस्थिति
एवं सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप न्यायाधीशों की विस्तारित जिम्मेदारियों का
विश्लेषण करता है। लोकतंत्र की स्थिरता और सफलता न्यायाधीशों की सजगता, संवेदनशीलता एवं उत्तरदायित्वपूर्ण आचरण पर अत्यधिक निर्भर
करती है, जिसे
यह अध्ययन केंद्र में रखता है ।
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Pages:149-151
How to cite this article:
अमित वर्मा "लोकतंत्र में न्यायाधीशों की जिम्मेदारी". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 11, Issue 3, 2025, Pages 149-151
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