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VOL. 11, ISSUE 3 (2025)
शिक्षक-प्रशिक्षणार्थियों की संवेगात्मक बुद्धि एवं आत्म-प्रत्यय: एक समीक्षात्मक अध्ययन
Authors
मनोज कुमार, अरुण कुमार कुलश्रेष्ठ
Abstract
समाज व राष्ट्र के निर्माण का कार्य शिक्षक द्वारा होता है। प्रभावी शिक्षक बनने के लिए न केवल शैक्षणिक ज्ञान एवं कौशल का अधिग्रहण शामिल है, बल्कि अपने स्वयं के मनोवैज्ञानिक परिदृश्य की गहरी समझ भी शामिल है। इस समझ के केंद्र में दो परस्पर जुड़ी हुई अवधारणाऐं हैं संवेगात्मक बुद्धि एवं आत्म-प्रत्यय। संवेगात्मक बुद्धि के उभरते क्षेत्र संवेगों को प्रभावी ढंग से समझने, प्रबंधित करने एवं उपयोग करने की क्षमता ने व्यक्तिगत कल्याण, पारस्परिक सम्बन्धों और व्यावसायिक सफलता में अपनी अहम भूमिका के लिए महत्वपूर्ण मान्यता प्राप्त की है, विशेष रूप से शिक्षण जैसे मानव-केंद्रित व्यवसाय में। साथ ही आत्म-प्रत्यय, जिसे सामान्य तौर पर मैं कौन हूँ? के बारे में व्यक्ति की धारणा के रूप में परिभाषित किया जाता है, अपने बारे में विश्वास, दृष्टिकोण एवं विचारों की एक बहुआयामी प्रणाली को शामिल करती है। शिक्षक-प्रशिक्षणार्थियों के लिए मजबूत एवं सकारात्मक आत्म-प्रत्यय महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उनके आत्मविश्वास, कक्षा-प्रबंधन एवं समग्र शिक्षण प्रभावकारिता को गहराई से प्रभावित करता है। शोध अध्ययन का उद्देश्य शिक्षक-प्रशिक्षणार्थियों की संवेगात्मक बुद्धि एवं आत्म-प्रत्यय के मध्य सम्बन्धों का अध्ययन करना है। प्रस्तुत शोध अध्ययन में संवेगात्मक बुद्धि एवं आत्म-प्रत्यय की अवधारणा, संवेगात्मक बुद्धि एवं आत्म-प्रत्यय के मध्य सम्बन्धों की चर्चा की गई है।
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Pages:135-139
How to cite this article:
मनोज कुमार, अरुण कुमार कुलश्रेष्ठ "शिक्षक-प्रशिक्षणार्थियों की संवेगात्मक बुद्धि एवं आत्म-प्रत्यय: एक समीक्षात्मक अध्ययन". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 11, Issue 3, 2025, Pages 135-139
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