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International Journal of
Humanities and Social Science Research
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VOL. 2, ISSUE 8 (2016)
भारत की परम्पराओं : नारी के सामाजिक स्थिति का पुनरावलोकन
Authors
अर्चना मिश्रा
Abstract
‘‘नारी का मनुष्य-जाति की उत्पत्ति में ही नही वरन् समाज निर्माण में भी नारी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। एक बेटी, बहन, पत्नी और माता के रूप में वह अपने कत्र्तव्यों का पालन करती हुई जीवन का अर्थ व्यक्त करती है, उसी से सम्पूर्ण मानव जाति के भाग्य का निर्णय होता है। स्त्री को स्वभाव से ही कोमल, भावुक और ममता की प्रतिमूर्ति माना गया है। उसे लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, काली आदि रूपों में पूजा गया है। स्त्रियों को धन, ज्ञान और शक्ति का प्रतीक माना गया है। हमारे देश को भी भारत माता कहकर सम्बोधित किया जाता है। स्त्री को पुरुषों का आधा अंग कहा गया और उसे अद्र्धागिंनी के रूप में स्थान दिया गया। कोई भी कर्तव्य बिना स्त्री के अधूरा है। कहा भी गया है कि-‘‘नारी परिवार की नीव है, परिवार, समुदाय की तथा समुदाय राष्ट्र की।’’1 इससे स्पष्ट होता है कि स्त्री राष्ट्र की नीव है। जिस देश में स्त्रियों का सम्मान होगा, वह राष्ट्र एक आदर्श राष्ट्र होगा। पुरुष को एक ऐसे वृृक्ष की उपमा दी जा सकती है जो अपने चारों ओर के छोटे-छोटे पौधों से जीवन रस पाकर आकाश की ओर बढ़ता जाता है तो स्त्री को ऐसी लता कहना अनुचित न होगा जो पृथ्वी से बहुत थोड़ा सा स्थान लेकर अपनी सघनता में बहुत से अंकुरो को पनपाती हुई उस वृक्ष की विशालता चारों ओर से ढक लेती है। प्रकृति ने उसके शरीर को ही अधिक सुकुमार नहीं बनाया वरन् उसे मनुष्य की जननी का पद देकर उसके हृदय में अधिक कोमलता भर दी। सृष्टि के प्रारम्भ से ही नारी ने सामाजिक-जीवन के पोषण में अपनी ममता, वात्सल्य, त्याग, करूणा, कोमलता एंव मधुरता से अपूर्व योगदान दिया है। इतिहास साक्षी है कि पुरुष ने जीवन में प्रगति-पथ पर अग्रसर होने के लिए मां, बहन, पत्नी और प्रेयसी आदि किसी-न-किसी रूप में नारी से सहायता एवं प्रेरणा अवश्य ली है।
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Pages:30-36
How to cite this article:
अर्चना मिश्रा "भारत की परम्पराओं : नारी के सामाजिक स्थिति का पुनरावलोकन". International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol 2, Issue 8, 2016, Pages 30-36
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